जीवनी -

डॉ० वेदप्रकाश आर्य। (जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व)

[अ] जीवन

जन्म -

डॉ० वेदप्रकाश आर्य का जन्म १२ मार्च १९५२ को रंग खेलनेवाली होली के दिन, उत्तरप्रदेश में मेरठ जनपद के कलंजरी ग्राम में हुआ।

शिक्षा-

डॉ० वेदप्रकाश आर्य की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम की प्राथमिक पाठशाला में हुई। आपने गुरूकुल सर्वोदय इण्टरकॉलिज, पाँचली [मेरठ] में कक्षा ८ तक, किसान इण्टर कॉलिज मुहिउद्दीनपुर [मेरठ] में इण्टरमीडिएट तक, मेरठ कॉलिज, मेरठ से बी.ए., एम. ए. [अर्थशास्त्र] तथा एम. ए. [हिन्दी] तक शिक्षा ग्रहण की। आपने १९७४ में मेरठ विश्वविधालय से हिन्दी में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।



विवाह-

आपका विवाह १७ जून १९७१ को श्रीमती श्यामकुमारी के साथ हुआ।

सन्तान-

आपके दो सुपुत्र हैं। बड़े सुपुत्र डॉ० प्रियांक आर्य एम.एस.सी. [पर्यावरण विज्ञान], पीएच.डी. हैं, जो एक प्रतिष्ठित कम्पनी़ में वरिष्ठ महाप्रबन्धक हैं।

आपके छोटे सुपुत्र डॉ० श्वेतांक आर्य [एम.सी.ए., एम० टैक, एम.बी.ए., पीएच.डी.] हैं, जो गुरूकुल कौगउ़ी विश्वविघालय, हरिद्वार के कम्प्यूटर साइन्स विभाग में प्राध्यापक हैं।

सम्प्रति-

डॉ० वेदप्रकाश आर्य मेरठ कॉलिज, मेरठ के हिन्दी-विभाग में प्राध्यापक हैं। आप ‘हिन्दी साहित्य पर महार्षि दयानन्द का प्रभाव’ विषय को लेकर अब तक अनेक शोधार्थियों को पीएच.डी. की उपाधि हेतु शोधकार्य करा चुके हैं।

[आ] व्यक्तित्व

डॉ० वेदप्रकाश आर्य वैदिक धर्म, महर्षि दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज के सच्चे भक्त हैं। आप अपने परिवार के साथ प्रतिदिन ‘पंचमहायज्ञ’ करते हैं।

मेरठ कॉलिज में सेवा के साथ-साथ आपका अधिकांश समय ईश्वर-उपासना, योग-साधना, साहित्य-लेखन,वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार और आयुर्वैदिक ओषधियों के अनुसन्धान में ही व्यतीत होता है।

आपका जीवन एवं स्वभाव अत्यन्त शुद्ध, सरल और सात्विक है। आप वैदिक धर्म के सिद्धान्तों पर आधारित पवित्र जीवन जीते हैं। आप अपने जीवन में अत्यन्त सुख, शान्ति और सरलतापूर्वक रहते हैं। वर्तमान में आपका निवास-स्थान एन. एच. - १७, ‘वेद-मन्दिर’, पल्लवपुरम-२, मेरठ है। आर्य-समाज के सत्सगों में प्रायः आपके आध्यात्मिक प्रवचन होते रहते हैं। आर्य-समाज में आपका स्थान सर्वोच्च कोटि के विद्वानों मे है।

[इ] कृतित्व

१. श्रेष्ठ साहित्यकार - डॉ० वेदप्रकाश आर्य अब तक ४० से भी अधिक पुस्तकों की रचना कर चुके हैं, जिनमें से प्रकाशित प्रमुख पुस्तकें इस प्रकार हैं-

१. ईश्वर-उपासनाः क्यों और कैसे? १६. भक्ति-चालीसा [काव्य]
२. ईश्वर-उपासना-विधि १७. वेद-चालीसा [काव्य]
३. पंचमहायज्ञ १८. दयानन्द-चालीसा [काव्य]
४. विद्यार्थी-जीवन १९. राम-चालीसा [काव्य]
५. जीवन-दर्शन [काव्य] . कृष्ण-चालीसा [काव्य]
६. सूर्योदय [काव्य] २१.शिव-चालीसा [काव्य]
७. भारत-दुर्दशा [काव्य] २२. हनुमान-चालीसा [काव्य]
८. महर्षि दयानन्द, आर्य समाज और हम २३. दयानन्द-महिमा [काव्य]
९. भारतवर्ष की दुर्दशा और हमारा कर्तव्य २४. आर्यसमाज-महिमा [काव्य]
. प्राणायाम २५. पंचयज्ञ-महिमा [काव्य]
११. स्वास्थ्य के शत्रु २६. जीवन का उद्देश्य [काव्य]
१२. भारतवर्षोन्नति कैसे हो ?२७. महर्षि दयानन्द
१३. ओ३म्-चालीसा [काव्य] २८. दुःखों से मुक्ति
१४. ईश्वर-चालीसा [काव्य] २९. वेद-वाणी
१५. यज्ञ-चालीसा [काव्य] . राष्ट्र-रक्षा कैसे करें?

२. वैदिक धर्म-प्रचारक - विश्व में सर्वोत्तम वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करना डॉ० वेदप्रकाश आर्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य है। उसकी पूर्ति हेतु अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों की रचना तो कर ही चुके हैं, इसके साथ ही देश भर में आर्य-समाज के सहयोग से वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार मे भी लगे हुए हैं।

३. स्वदेश-प्रेमी- डॉ० वेदप्रकाश आर्य भारतवर्ष की वर्तमान दुरर्शा को देखकर बहुत अधिक चिन्तित हैं। इसके लिये आप भारतवर्ष में विद्यमान भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों को ही मुख्य रूप् से दोषी मानते हैं। आपने स्वदेश की उन्नति के लिए ही विशाल ग्रन्थ- ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो’, ‘भारत-दुर्दशा‘, तथा ‘भारतवर्ष की वर्तमान दुर्दशा और हमारा कर्तव्य‘ नामक पुस्तकों की रचना की है।

४. आदर्श-शिक्षक - वर्तमान में जहाँ शिक्षक भी पूर्णतः पाश्चात्य असभ्यता के रंग में रँग चुके हैं, वहीं डॉ० वेदप्रकाश आर्य पूर्णतः भारतीय संस्कृति के अनुसार जीवन जीनेवाले आदर्श शिक्षक हैं। वे सदैव भारतीय वेषभूषा ही धारण करते हैं तथा अपने व्यवहार में सदैव राष्ट्रभाषा का ही प्रयोग करते हैं। आपकी मान्यता है कि सम्पूर्ण देश में एक समान शिक्षा तथा शिक्षा का माध्यम राष्ट्रभाषा ही होनी चाहिए। आप पाश्चात्य जीवन शैली तथा सहशिक्षा को विघार्थियों और शिक्षकों के चारित्रिक पतन का मुख्य कारण मानते हैं। आप भारतीयों से वार्तालाप में कभी भी आनावश्यक रूप से अंग्रेजी का प्रयोग नहीं करते तथा आप कक्षा में पढ़ाते समय भी अंग्रेजी का प्रयोग कभी नहीं करते। राष्ट्रभाषा के प्रति ऐसा सच्चा प्रेम अब कठिनाई से ही देखने को मिलता है।

५. महान् लेखक एवं कुशल वक्ता- डॉ० वेदप्रकाश आर्य वास्तव में एक महान लेखक, कुशल वक्ता एवं महाकवि हैं। आपके साहित्य को पढ़ते ही पाठक भाव-विभोर हो जाता है। कक्षा में विद्यार्थिर्यों को पढ़ाते और सत्संगों में प्रवचन करते समय आपके सरल, स्वभाविक, रोचक, प्रमाणिक एवं तर्कपूर्ण व्याख्यानों से सभी लोग प्रसन्न, सन्तुष्ट और प्रभावित हो जाते हैं।

६. महाकवि - डॉ० वेदप्रकाश आर्य बाल्यकाल से ही काव्य-रचना करते रहे हैं। छन्दोबद्ध काव्य-रचना की तो उन्हें सिद्धि प्राप्त है। आप किसी भी विषय पर कभी भी काव्य-रचना करने में समर्थ हैं। आदर्श गद्य एवं पद्य-लेखन हेतु आपको परमेश्वर का अदभुत वरदान प्राप्त है।

आप स्वरचित गीतों को संगीत के साथ इतने प्रभावशाली ढंग से गाते हैं कि श्रोतागण भाव-विभोर हो उठते हैं। आपने मानव-जीवन के प्रत्येक उपयोगी विषय पर अनुपम काव्य रचनाएँ लिखी हैं।

७. कुशल आर्युर्वेदज्ञ - डॉ० वेदप्रकाश आर्य की आयुर्वेद में भी गहरी रूचि है। आपने स्वाध्याय और अनुसन्धान के आधार पर सैंकड़ों रोगों की औषधियों का अदभुत ज्ञान प्राप्त किया है। आपने परोपकार की भावना से अनेक आयुर्वैदिक औषधियों का अनुसन्धान एवं निर्माण किया है, जिनसे अब तक सहस्रों लोग स्वस्थ हो चुके हैं।

८. वर्तमान एवं भावी योजनाएँ - डॉ० वेदप्रकाश आर्य के जीवन के ये चार लक्ष्य हैं--

(१) परमेश्वर की नित्य उपासना करना, (२) शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति हेतु श्रेष्ठ साहित्य की रचना करना, (३) स्वराष्ट्र की उन्नति करना और (४) विश्व में वैदिक धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये आप निर्बाध रूप से --

    १. प्रतिदिन सन्ध्या, हवन, वेदों का स्वाध्याय, प्रणायाम, योग-साधना और साहित्य-लेखन करते हैं।

    २. आप देश भर में स्थान-स्थान पर निःशुल्क “ईश्वर-उपासना, योग-साधना एवं आयुर्वेद चिकित्सा-शिविर” लगाते हैं।

    ३. डॉ० वेदप्रकाश आर्य ने अपने इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ‘वैदिक धर्म संस्थान’ [पंजीकृत धर्मार्थ न्यास] की स्थापना की है। आप देश-विदेश के विद्वान्, धनवान् और चरित्रावान् लोगों को इस संस्थान के सदस्य बनाकर भारतवर्षोन्नति का मार्ग दिखाना तथा सम्पूर्ण विश्व में वैदिक धर्म, संस्कृति और आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं।

आपने अपने तन, मन और धन इन कार्यों को करने के लिए ही समर्पित कर दिये हैं। आपकी विद्वत्ता, देशप्रेम, धर्मपरायणता, सरलता, सात्विकता और परोपकार को देखकर सभी सज्जनों को अपार हर्ष होता है। आपका आदर्श जीवन सभी के लिए प्रेरणाप्रद है। आप-जैसे सुयोग्य धर्मात्माओं के बल पर ही संसार में वैदिक धर्म जीवित है और रहेगा।